बाराबंकी। कर्बला सिविल लाइन्स में अल्हाज  सैयद  शुजाअत हुसैन रिज़वी को श्रद्धा सुमन अर्पित करने के लिए उनकी पुण्य तिथि पर आयोजित मजलिस को खिताब करते हुए 1200 मकतबों के बोर्ड तन्ज़ीमुल मकातिब के सिक्रेटरी मौलाना सफ़ी हैदर साहब ने कहा सारे इन्सानों के साथ इन्साफ करो। चाहे खुद को नुकसान व तकलीफ हो रही हो तब भी इन्साफ करो यही इस्लाम का पैगाम है।
 मालूम हो कि स्व0 सैय्यद शुजाअत हुसैन रिज़वी का देहान्त 23 मई 2010 को हुआ था। वह तहलका टुड़े के संस्थापक सम्पादक के साथ कर्बला सिविल लाइन्स के खादिम, अन्जुमन पैग़ामे कर्बला और अन्जुमन अब्बासिया नगराम के संरक्षक, हुसैनी मिशन , हुसैन टेकरी शरीफ जावरा के वाइस प्रेसीडेन्ट के अलावा कई सामाजिक तन्ज़ीमों के पदाधिकारी थे उनकी पुण्य तिथि पर हर वर्ष मजलिस के साथ कई कार्यक्रमों का आयोजन सैय्यद शुजाअत हुसैन रिज़वी नगरामी मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा किया जाता रहा है।
 मौलाना सफ़ी हैदर साहब ने आगे कहा हज़रत अली (अ.) के निगाह में हर वह घर वीराऩा है जिसमे ईश्वर  की याद (यादे इलाही) न हो। हज़रत अली (अ.) दुआए कुमैल में कहते है ऐ रब मेरी जिन्दगी के हर क्षण को अपनी याद से आबाद कर दे, और अपनी खिदमत से जोड़ दे और उसे कुबुलियत से भी जोड़ दे।
मौलाना सफी साहब ने आगे कहा हुक्मे इलाही (ईश्वरीय  सन्देश ) को हर इन्सान को हर हाल में मानना होगा यदि मालूम न हो तो उसे मालूम करके अमल करना होगा। ईश्वर से दुआ सिर्फ़ मकसद हांसिल करने के लिए न करें, बल्कि उससे कुरबत हांसिल करने के लिए करें। ईष्वर इल्म देता है लेकिन हांसिल करने वाला अपनी सलाहियत से कबूल करता है। इसमे देने वाले की गलती नही है बल्कि इल्म कबूल करने वाले की कमी है कि वह कितनी तवज्जो और जुस्तजू से इल्म सीखने की कोशिश  कर रहा है। 
अन्त में हजरत अली अकबर (अ.) वह हजरत इमामे हुसैन (अ.) की शहादत के दर्दनाक मसायब पेष किये जिसे सुनकर अज़ादार रो पड़े।
 मजलिस से पूर्व डाॅ रज़ा मौरान्वी ने नज़रानये अकीदत पेश करते हुए पढ़ा-
यज़ीद शाह से बय्यत को हांथ मांगता है
फ़कीर होते  हुए क़ायनात मांगता है।

कशिश  सण्डीलवी ने पढ़ा-
हाशिम  के खानदान का माहिर तमाम है,
अब्बास क़ायनाते वफ़ा का ईमाम है।

अज़मल किन्तूरी ने पढ़ा-
जिसके सदके में बनायी है खुदा ने क़ायनात,
बस वही तो हैं जो वजहे खिलकते कौनैन हैं।

मुहिब रिज़वी ने पढ़ा-
लज्जते हुस्ने पयम्बर की निशानी लिख दे,
 आओ किरतास से अकबर की जवानी लिख दें।

 सरवर अली रिज़वी ने पढ़ा-
मदहे मौला का मुझे इतना सिला दे यारब,
 तू मुझे साहबे किरदार बना दे यारब।
 अम्न फैलाने में सरवर का भी किरदार रहे,
 अपनी रहमत से मुझे ऐसा बना दे यारब।
मजलिस का आगाज कलामे रब्बानी से अयान अब्बास ने किया। हदीसे किसा की तिलावत मोहम्मद  हैदर आब्दी ने की।
 नगराम से आये गुलाब अली ने अपनी बेहतरीन अंदाज़ में सोज़ खवानी करते हुए पढ़ा-
मेरे गुनाह फरिश्तो है बेशुमार  तो क्या?
 अली को आने दो सारा हिसाब कर दूंगा।
मजलिस की समाप्ति पर फातहे का इन्तेज़ाम हुआ।
 रिज़वान मुस्तफा व रेहान मुस्तफा ने मजलिस में आये तमाम लोगों का शुक्रिया  अदा किया। 

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सारे इन्सानों के साथ इन्साफ करो-मौलाना सफ़ी हैदर,सैयद शुजाअत हुसैन रिज़वी की पुण्य तिथि पर मजलिस का आयोजन

बाराबंकी। कर्बला सिविल लाइन्स में अल्हाज  सैयद  शुजाअत हुसैन रिज़वी को श्रद्धा सुमन अर्पित करने के लिए उनकी पुण्य तिथि पर आयोजित मजलिस को खिताब करते हुए 1200 मकतबों के बोर्ड तन्ज़ीमुल मकातिब के सिक्रेटरी मौलाना सफ़ी हैदर साहब ने कहा सारे इन्सानों के साथ इन्साफ करो। चाहे खुद को नुकसान व तकलीफ हो रही हो तब भी इन्साफ करो यही इस्लाम का पैगाम है।
 मालूम हो कि स्व0 सैय्यद शुजाअत हुसैन रिज़वी का देहान्त 23 मई 2010 को हुआ था। वह तहलका टुड़े के संस्थापक सम्पादक के साथ कर्बला सिविल लाइन्स के खादिम, अन्जुमन पैग़ामे कर्बला और अन्जुमन अब्बासिया नगराम के संरक्षक, हुसैनी मिशन , हुसैन टेकरी शरीफ जावरा के वाइस प्रेसीडेन्ट के अलावा कई सामाजिक तन्ज़ीमों के पदाधिकारी थे उनकी पुण्य तिथि पर हर वर्ष मजलिस के साथ कई कार्यक्रमों का आयोजन सैय्यद शुजाअत हुसैन रिज़वी नगरामी मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा किया जाता रहा है।
 मौलाना सफ़ी हैदर साहब ने आगे कहा हज़रत अली (अ.) के निगाह में हर वह घर वीराऩा है जिसमे ईश्वर  की याद (यादे इलाही) न हो। हज़रत अली (अ.) दुआए कुमैल में कहते है ऐ रब मेरी जिन्दगी के हर क्षण को अपनी याद से आबाद कर दे, और अपनी खिदमत से जोड़ दे और उसे कुबुलियत से भी जोड़ दे।
मौलाना सफी साहब ने आगे कहा हुक्मे इलाही (ईश्वरीय  सन्देश ) को हर इन्सान को हर हाल में मानना होगा यदि मालूम न हो तो उसे मालूम करके अमल करना होगा। ईश्वर से दुआ सिर्फ़ मकसद हांसिल करने के लिए न करें, बल्कि उससे कुरबत हांसिल करने के लिए करें। ईष्वर इल्म देता है लेकिन हांसिल करने वाला अपनी सलाहियत से कबूल करता है। इसमे देने वाले की गलती नही है बल्कि इल्म कबूल करने वाले की कमी है कि वह कितनी तवज्जो और जुस्तजू से इल्म सीखने की कोशिश  कर रहा है। 
अन्त में हजरत अली अकबर (अ.) वह हजरत इमामे हुसैन (अ.) की शहादत के दर्दनाक मसायब पेष किये जिसे सुनकर अज़ादार रो पड़े।
 मजलिस से पूर्व डाॅ रज़ा मौरान्वी ने नज़रानये अकीदत पेश करते हुए पढ़ा-
यज़ीद शाह से बय्यत को हांथ मांगता है
फ़कीर होते  हुए क़ायनात मांगता है।

कशिश  सण्डीलवी ने पढ़ा-
हाशिम  के खानदान का माहिर तमाम है,
अब्बास क़ायनाते वफ़ा का ईमाम है।

अज़मल किन्तूरी ने पढ़ा-
जिसके सदके में बनायी है खुदा ने क़ायनात,
बस वही तो हैं जो वजहे खिलकते कौनैन हैं।

मुहिब रिज़वी ने पढ़ा-
लज्जते हुस्ने पयम्बर की निशानी लिख दे,
 आओ किरतास से अकबर की जवानी लिख दें।

 सरवर अली रिज़वी ने पढ़ा-
मदहे मौला का मुझे इतना सिला दे यारब,
 तू मुझे साहबे किरदार बना दे यारब।
 अम्न फैलाने में सरवर का भी किरदार रहे,
 अपनी रहमत से मुझे ऐसा बना दे यारब।
मजलिस का आगाज कलामे रब्बानी से अयान अब्बास ने किया। हदीसे किसा की तिलावत मोहम्मद  हैदर आब्दी ने की।
 नगराम से आये गुलाब अली ने अपनी बेहतरीन अंदाज़ में सोज़ खवानी करते हुए पढ़ा-
मेरे गुनाह फरिश्तो है बेशुमार  तो क्या?
 अली को आने दो सारा हिसाब कर दूंगा।
मजलिस की समाप्ति पर फातहे का इन्तेज़ाम हुआ।
 रिज़वान मुस्तफा व रेहान मुस्तफा ने मजलिस में आये तमाम लोगों का शुक्रिया  अदा किया। 

News Posted on: 10-03-2017
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