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अदालते- आलिया को मुसलमानों ने नकारा तो ?

के विक्रम राव 
सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) के बहस में हिस्सा लेने के बाद इस्लामी तंजीमों ने आज लोकसभा में पेश हो रहे तीन तलाक संबंधी विधेयक का विरोध करने का फैसला चालू कर दिया है। शाहबानों केस पर न्यायिक निर्णय की मुखालफत की तर्ज पर। आज जब विधि मंत्री और पटना के वकील रविशंकर प्रसाद ने लोकसभा में विधेयक पेश किया तो कांग्रेस प्रतिपक्ष के नेता मापन्ना मल्लिकार्जुन खड़गे (Mallikarjun Kharge) ने विरोध में कहा कि इससे मुसलमानों के धार्मिक मूलाधिकार का हनन होता है। उनके पीछे बैठे राहुल गाँधी (Rahul Gandhi) मौन रहे। उनपर हाल ही में देखे गुजरात के मन्दिरों का प्रभाव दिखा नहीं। कांग्रेसी तर्क के प्रत्युत्तर में रविशंकर प्रसाद (Ravi Shankar Prasad) ने कहा कि क्या मुस्लिम महिलाओं के मूलाधिकार का तीन तलाक द्धारा हनन नही होगा ? 
 सवाल था कि क्या भारत की संसद (Parliament of India) मुस्लिम महिलाओं पर मर्दों द्धारा हो रहे इन अत्याचारों पर अपराधिक मौन बनाये रखेगी ?
 नई उम्र के लोगों के सूचनार्थ शाहबानों निर्णय को दुहरा दें। अप्रैल 1978 में इन्दौर शहर में एक 62 वर्षीया बुढ़िया शाहबानों बेगम को उसकें वकील-पति मोहम्मद अहमद खान ने घर से धकिया कर निकाल दिया। तीन बार तलाक कह दिया। जिला  अदालत से उच्च न्यायालय तक सात वर्षों की सुनवाई के बाद 23 अप्रैल 1985 को उच्चतम कोर्ट ने निर्णय दिया कि भारतीय कानून के मुताबिक पति मोहम्मद अहमद खान को बीबी शाहबानो को गुजारा भत्ता देना पड़ेगा। बस फिर क्या था, सत्तर सालवाली, डेढ़ पसली की, चेहरा झुर्रीदार, बोझिल कमर लिये, कब्र में एक पैर लटकायें शाहबानों पर कहर बरपाया गया। सारे इस्लामी संगठन इस अदालती फैसले में संशोधन के लिये एक अबला पर टूट पडे। राजीव गाँधी सहम गये। कोई भी संगठन अथवा पुरूष इस शोषिता के पक्ष में उठा नहीं। केवल एक जांबांज था आरिफ मोहम्मद खान जिसने मंत्रीपद से त्यागपत्र दे दिया। दानिश्वर, आलिम, सहाफी आदि सभी इस जालिमाना हरकत पर खामोश रहे। गैरजानिबदार रहे। जब लोकसभा में संशोधन राजीव सरकार ने रखा तो मानवीय संवेदनाओं के प्रति सांसद निरपेक्ष रहे। उस महिला-विरोधी कदम का समर्थन कर दिया। शाहबानों मत्स्य न्याय की शिकार बन गई। ऐसा प्रतीत हुआ कि अंबेडकरवादी समतामूलक भारतीय संविधान के बजाय कर्नल गड्डाफी के लीबिया की भांति भारत निजामे मुस्तफा द्धारा शासित हो गया।
 मगर आखिर में अब सवाल उठता है कि खुदा न खास्ता सर्वोच्च न्यायालय ने यदि फैसला सुना दिया कि राम वहीं जन्मे थे, तो ?  उसे क्रियान्वित करने हेतु उस वक्त क्या नभ सेना फैजाबाद के आसमान पर, जलसेना सरयू में और थल सेना साकेतक्षेत्र में उतरेगी ? 
आदेश कैसे लागू होगा ? 
K Vikram Rao
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News Posted on: 28-12-2017
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